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"जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, सब्र बनाए रखें | जिंदगी बदलने वाली सीख-Self Confidence Series-4

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  जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, सब्र बनाए रखें जिंदगी का दूसरा नाम संघर्ष है। हर इंसान की जिंदगी में कभी न कभी ऐसा समय जरूर आता है, जब उसे लगता है कि अब सब कुछ खत्म हो गया है। मेहनत करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती, अपने लोग साथ छोड़ देते हैं और कई बार परिस्थितियां इतनी मुश्किल हो जाती हैं कि इंसान अंदर से टूटने लगता है। उसे समझ नहीं आता कि आगे क्या करे और अपनी परेशानियों से कैसे बाहर निकले। लेकिन ऐसे समय में हमें एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, हमें अपना सब्र बनाए रखना चाहिए। जिंदगी में सब्र का सबसे खूबसूरत उदाहरण एक माँ होती है। जब एक माँ के गर्भ में बच्चा पल रहा होता है, तो वह लगभग नौ महीने तक अपने बच्चे के आने का इंतजार करती है। इस दौरान उसे कई तरह की शारीरिक परेशानियों, तकलीफों और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। फिर भी वह अपने बच्चे के आने की उम्मीद में हर दिन बिताती है। वह जानती है कि इस लंबे इंतजार के बाद उसकी जिंदगी में एक नई खुशी आने वाली है। आखिरकार, जब वह अपने बच्चे को अपनी गोद में लेती है, तो उसकी बहुत-सी तकलीफें उस खुशी के सामने ...

Leader की Credibility कैसे बनती है?-Self Confidence Series-3

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किसी भी Leader की असली ताकत उसके पद , कुर्सी या अधिकार में नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है Credibility यानी विश्वसनीयता । लोग किसी Leader की बात केवल इसलिए नहीं मानते कि उसके पास अधिकार है , बल्कि इसलिए मानते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि यह व्यक्ति जो कहता है , वही करता भी है। इसे एक डॉक्टर के उदाहरण से समझ सकते हैं। जब कोई व्यक्ति पहली बार किसी डॉक्टर के पास जाता है , तो शुरुआत में वह डॉक्टर के बारे में ज्यादा नहीं जानता। लेकिन डॉक्टर मरीज की बात ध्यान से सुनता है , सही जानकारी देता है , जिम्मेदारी से इलाज करता है और समय के साथ मरीज को बेहतर अनुभव मिलता है। धीरे - धीरे मरीज का भरोसा बढ़ता जाता है। फिर वही मरीज उस डॉक्टर को अपने परिवार और दोस्तों को भी recommend करने लगता है। समय के साथ डॉक्टर की Reputation और Credibility इतनी मजबूत हो जाती है कि लोग दूर से भी उसके पास इलाज के लिए आने लगते हैं। यही प्रक्रिया एक Leader...

भावना में लिया Decision कैसे रोकें?-Knowledge series-2

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  ज़िंदगी में कई बार ऐसे पल आते हैं जब हमारी भावनाएँ इतनी तेज हो जाती हैं कि हम बिना ज्यादा सोचे कोई बड़ा फैसला ले लेते हैं। गुस्सा , दुख , प्रेम , डर , अपमान या अत्यधिक उत्साह — इनमें से कोई भी भावना हमारे सोचने के तरीके को प्रभावित कर सकती है। समस्या भावना होने में नहीं है , समस्या तब होती है जब कुछ मिनटों की भावना के आधार पर ऐसा फैसला ले लिया जाए , जिसका असर वर्षों तक बना रहे। इसलिए जरूरी है कि हम भावनाओं को दबाएँ नहीं , बल्कि भावना और निर्णय के बीच थोड़ा समय रखना सीखें। भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा से सीख महाभारत में भीष्म पितामह का प्रसंग इस बात को समझने का एक प्रभावशाली उदाहरण है। राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे , लेकिन सत्यवती के पिता की इच्छा थी कि उसकी संतान ही आगे चलकर हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए देवव्रत ने पहले सिंहासन पर अपना अधिकार छोड़ने का संकल्प लिया। लेकिन जब उन्ह...